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Essay On Indian Culture In Hindi Language

भारत की संस्कृति और सभ्यता संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है। यह संस्कृति कई चीज़ों के मेल-जोल का नतीजा है जिसमें देश का लम्बा इतिहास, विविध भूगोल और खुद की प्राचीन विरासत शामिल हैं। पड़ोसी और दुनिया के दूसरे देशों के रिवाज़, परम्पराओं और विचारों का भी इस संस्कृति में समावेश है। पिछली पाँच सहस्राब्दियों का इतिहास देखा जाए तो ये ज्ञात होता है की ये रीति-रिवाज़, भाषाएँ, प्रथाएँ और परंपराएँ एक-दूसरे से परस्पर संबंधों के कारण विकसित हुईं। विभिन्न धार्मिक प्रणालियाँ जैसे हिन्दू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म जैसे धर्मों भी इसी संस्कृति में जन्मी और पली बढीं। इन विभिन्ताओं के मिश्रण से उत्पन्न हुए विभिन्न धर्म और परम्पराओं ने विश्व के अलग – अलग हिस्सों को भी काफ़ी प्रभावित किया है।

यहाँ हम भारत की संस्कृति और सभ्यता के विभिन्न पहलुओं जैसे धर्म, समाज, परम्परा एवं रीति, पहनावा, साहित्य, संगीत, नृत्य, नाटक और रंगमंच, चित्रकारी, मूर्तिकला, वास्तुकला,दर्शन शास्त्र और मनोरंजन आदि महत्वपूर्ण घटकों के बारे इन अलग-अलग भागों में विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगे।

 

List of five essays on Indian Culture (written in Hindi Language).

Content:

  1. भारतीय खंस्कृति |
  2. भारतीय धर्मों का स्वरूप और उसकी विशेषताएं |
  3. भारत की महान दार्शनिक परम्पराएं |
  4. भरतीय कलाएं विकास एवं उनका स्वरूय |
  5. लोकसंस्कृति की समृद्ध विरासत |

Essay on Indian Culture

Hindi Essay # 1 भारतीय खंस्कृति |Indian Cultrure

1. प्रस्तावना ।

2. संस्कृति का अर्थ ।

3. सभ्यता और संस्कृति ।

4. भारतीय संस्कृति और उसकी विशिष्टताएं ।

5. उपसंहार ।

यूनान मिश्र रोमां मिट गये जहां से । कुछ बात है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी ।।

1. प्रस्तावना:

किसी देश या समाज के परिष्कार की सुदीर्घ परम्परा होती है । उस परम्परा में प्रचलित उन्नत एवं उदात्त विचारों की भूखला ही किसी देश या समाज की संस्कृति कहलाती है, जो उस देश या समाज के जीवन को गति प्रदान करती है ।  संस्कृति में किसी देश, कालविशेष के आदर्श व उसकी जीवन पद्धति सम्मिलित होती है.। परम्परा से प्राप्त सभी विचार, शिल्प, वस्तु किसी देश की संस्कृति कहलाती है ।

2. संस्कृति का अर्थ:

संस्कृति शब्द संस्कार ने बना है । शाब्दिक अर्थ में संस्कृति का अर्थ है: सुधारने वाली या परिष्कार करने वाली । यजुर्वेद में संस्कृति को सृष्टि माना गया है । जो विश्व में वरण करने योग्य है, वही संस्कृति है ।

डॉ॰ नगेन्द्र ने लिखा है कि संस्कृति मानव जीवन की वह अवस्था है, जहां उसके प्राकृत राग द्वेषों का परिमार्जन हो जाता है । इस तरह जीवन को परिकृत एवं सम्पन्न करने के लिए मूल्यों, स्थापनाओं और मान्यताओं का समूह संस्कृति है ।

किसी भी देश की संस्कृति अपने आप में समग्र होती है । इससे उसका अत: एवं बाल स्वरूप स्पष्ट होता है । संस्कृति परिवर्तनशील है । यही कारण है कि एक काल के सांस्कृतिक रूपों की तुलना दूसरे काल से तथा दूसरे काल के सांस्कृतिक रूपों की अभिव्यक्तियों की तुलना नहीं करनी चाहिए, न ही एक दूसरे को निकृष्ट एवं श्रेष्ठ बताना चाहिए ।

एक मानव को सामाजिक प्राणी बनाने में जिन तत्त्वों का योगदान होता है, वही संस्कृति है । निष्कर्ष रूप में मानव कल्याण में सहायक सम्पूर्ण ज्ञानात्मक, क्रियात्मक, विचारात्मक गुण संस्कृति कहलाते हैं । संस्कृति में आदर्शवादिता एवं संक्रमणशीलता होती है ।

3. सभ्यता और संस्कृति:

सभ्यता को शरीर एवं संस्कृति को आत्मा कहा गया है; क्योंकि सभ्यता का अभिप्राय मानव के भौतिक विकास से है जिसके अन्तर्गत किसी परिकृत एवं सभ्य समाज की वे स्थूल वस्तुएं आती हैं, जो बाहर से दिखाई देती हैं, जिसके संचय द्वारा वह औरों से अधिक उन्नत एवं उच्च माना जाता है ।

उदाहरणार्थ, रेल, मोटर, सड़क, वायुयान, सुन्दर वेशभूषा, मोबाइल । संस्कृति के अन्तर्गत वे आन्तरिक गुण होते हैं, जो समाज के मूल्य व आदर्श होते हैं, जैसे-सज्जनता, सहृदयता, सहानुभूति, विनम्रता और सुशीलता । सभ्यता और संस्कृति का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है; क्योंकि जो भौतिक वस्तु मनुष्य बनाता है, वह पहले तो विचारों में जन्म लेती है ।

जब कलाकार चित्र बनाता है, तो वह उसकी संस्कृति होती है । सभ्यता और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं । संखातिविहीन सभ्यता की कल्पना नहीं की जा सकती है । जो सभ्य होगा, वह सुसंस्कृत होगा ही । सभ्यता और संस्कृति का कार्यक्षेत्र मानव समाज है ।

भारतीय संस्कृति गंगा की तरह बहती हुई धारा है, जो क्लवेद से प्रारम्भ होकर समय की भूमि का चक्कर लगाती हुई हम तक पहुंची है । जिस तरह गंगा के उद्‌गम स्त्रोत से लेकर समुद्र में प्रवेश होने वाली अनेक नदियां एवं धाराएं मिलकर उसमें समाहित हैं, उसी तरह हमारी संस्कृति भी है ।

हमारी संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है । अनेक प्रहारों को सहते हुए भी इसने अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखा है । हमारे देश में शक, हूण, यवन, मंगोल, मुगल, अंग्रेज कितनी ही जातियां एवं प्रजातियां आयीं, किन्तु सभी भारतीय संस्कृति में एकाकार हो गयीं ।

डॉ॰ गुलाबराय के विचारों में: ”भारतीय संस्कृति में एक संश्लिष्ट एकता है । इसमें सभी संस्कृतियों का रूप मिलकर गंगा में मिले हुए, नदी-नालों के जी की तरह (गांगेय) पवित्र रूप को प्राप्त करता है । भारतीय संस्कृति की अखण्ड धारा में ऐसी सरिताएं हैं, जिनका अस्तित्व कहीं नहीं दिखाई देता । इतना सम्मिश्रण होते हुए भी वह अपने मौलिक एवं अपरिवर्तित रूप में विद्यमान है ।”

4. भारतीय संस्कृति की विशिष्टताएं:

भारतीय संस्कृति कई विशिष्टताओं से युक्त है । जिन विशिष्टताओं के कारण वह जीवित है, उनमें प्रमुख हैं:

1. आध्यात्मिकता:

आध्यात्म भारतीय संस्कृति का प्राण है । आध्यात्मिकता ने भारतीय संस्कृति के किसी भी अंग को अछूता नहीं छोड़ा है । पुनर्जन्म एवं कर्मफल के सिद्धान्त में जीवन की निरन्तरता में भारतीयों का विश्वास दृढ़ किया है और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के चार पुराषार्थो को महत्च दिया गया है ।

2. सहिष्णुता की भावना:

भारतीय संस्कृति की महत्पपूर्ण विशेषता है: उसकी सहिष्णुता की भावना । भारतीयों ने अनेक आक्रमणकारियों के अत्याचारों को सहन किया है । भारतीयों को सहिष्णुता की शिक्षा राम, बुद्ध. महावीर, कबीर, नानक, चैतन्य महात्मा गांधी आदि महापुरुषों ने दी है ।

3. कर्मवाद:

भारतीय संस्कृति में सर्वत्र करणीय कर्म करने की प्रेरणा दी गयी है । यहां तो परलोक को ही कर्मलोक कहा गया है । गीता में कर्मण्येवाधिकाररते मां फलेषु कदाचन पर बल दिया गया है । अथर्ववेद में कहा गया है-कर्मण्यता मेरे दायें हाथ में है, तो विजय निश्चित ही मेरे बायें हाथ में होगी ।

4. विश्वबसुत्च की भावना:

भारतीय संस्कृति सारे विश्व को एक कुटुम्ब मानते हुए समस्त प्राणियों के प्रति कल्याण, सुख एवं आरोग्य की कामना करती है । विश्व में किसी प्राणी को दुखी देखना उचित नहीं समझा गया है । सर्वे भद्राणी सुखिन: संतु सर्वे निरामया: । सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित् दुःखमायुयात ।

5. समन्वयवादिता:

भारतीय संस्कृति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है समन्वयवादिता । यहां के रुषि, मनीषी, महर्षियों व समाज सुधारकों ने सदैव समन्वयवादिता पर बल दिया है । भारतीय संस्कृति की यह समन्वयवादिता बेजोड़ है । अनेकता में एकता होते हुए भी यहां अद्‌भुत समन्वय है । भोग में त्याग का समन्वय यहां की विशेषता है ।

6. जाति एवं वर्णाश्रम व्यवस्था:

भारतीय संस्कृति में वर्णाश्रम एवं जाति-व्यवस्था श्रम विभाजन की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण थी । यह व्यवस्था गुण व कर्म पर आधारित थी, जन्म पर नहीं । 100 वर्ष के कल्पित जीवन को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास के अनुसार बांटा

गया । यह व्यवस्था समाज में सुख-शान्ति व सन्तोष की अभिवृद्धि में सहायक थी ।

7. संस्कार:

भारतीय संस्कृति में संस्कारों को विशेष महत्त्व दिया गया है । ये संस्कार समाज में शुद्धि की धार्मिक क्रियाओं से सम्बन्धित थे । इन अनुष्ठानों का महत्च व्यक्तियों के मूल्यों, प्रतिमानों एवं आदर्शों को अनुशासित व दीक्षित रखना होता है ।

8. गुरू की महत्ता:

भारतीय संस्कृति में गुरा को महत्त्व देते हुए उसे सिद्धिदाता, कल्याणकर्ता एवं मार्गदर्शक माना गया है । गुरा का अर्थ है: अन्धकार का नाश करने वाला ।

9. शिक्षा को महत्त्व:

भारतीय संस्कृति में शिक्षा को पवित्रतम प्रक्रिया माना गया है, जो बालकों का चारित्रिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक विकास करती है ।

10. राष्ट्रीयता की भावना:

भारतीय संस्कृति में राष्ट्रीयता की भावना को विशेष महत्त्व दिया गया है । जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी कहकर इसकी वन्दना की गयी है ।

11. आशावादिता:

भारतीय संस्कृति आशावादी है । वह निराशा का प्रतिवाद करती है ।

12. स्थायित्व:

यह भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण विशेषता है । यूनान, मिश्र, रोम, बेबीलोनिया की संस्कृति अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर नष्ट हो गयी है । भारतीय संस्कृति अनेक झंझावातों को सहकर आज भी जीवित है ।

13. अतिथिदेवोभव:

भारतीय संस्कृति में अतिथि को देव माना गया है । यदि शत्रु भी अतिथि बनकर आये, तो उसका सत्कार करना चाहिए ।

5. उपसंहार:

संस्कृति का निस्सन्देह मानव-जीवन में विशेष महत्त्व है । संस्कृति हमारा मस्तिष्क है, हमारी आत्मा है । संस्कृति में ही मनुष्य के संस्कार हस्तान्तरित होते हैं । संस्कृति वस्तुत: मानव द्वारा निर्मित आदर्शो और मूल्यों की व्यवस्था है, जो मानव की जीवनशैली में अभिव्यक्ति होती है । सभ्यता और संस्कृति एक दूसरे के पूरक हैं ।

भारतीय संस्कृति आज भी अपनी विशेषताओं के कारण विश्वविख्यात है । अपने आदर्शो पर कायम है । समन्वयवादिता इसका गुण है । चाहे धर्म हो या कला या भाषा, भारतीय संस्कृति ने सभी देशी-विदेशी संस्कृतियों को अपने में समाहित कर लिया । जिस तरह समुद्र अपने में विभिन्न नदियों के जल को एकाकार कर लेता है, भारतीय संस्कृति इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण है ।


Hindi Essay # 2 भारतीय धर्मों का स्वरूप और उसकी विशेषताएं |The Nature and Characteristics of Indian Religions

1. प्रस्तावना ।

2. धर्म क्या है?

3. भारतीय धर्मों का स्वरूप ।

4. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

भारत एक धर्म प्रधान देश है । यहां की संस्कृति धर्म प्राण रही है । मानव जाति की समस्त मूलभूत अनुभूतियों का सुन्दर स्वरूप है धर्म । धर्म मानव जीवन का अपरिहार्य तत्त्व है । धर्म शब्द में असीम व्यापकत्व है ।

किसी वस्तु का वस्तुतत्त्व ही उसका धर्म है । जैसे-अग्नि का धर्म है जलाना । राजा का धर्म है प्रजा की सेवा करना । धर्म वह तत्त्व है, जो मनुष्य को पशुत्व से देवत्व की ओर ले जाता है ।

भारतीयों ने सदा ही अपने प्रारम्भिक जीवन से धर्म की खोज में अपरिमित आनन्द का अनुभव किया है । इसे मानव जीवन का सार माना गया है । भारतीय समाज में जो प्रमुख धर्म प्रचलित हैं, उनमें प्रमुख हैं: हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी एवं यहूदी धर्म ।

2. धर्म क्या है?:

धर्म शब्द धृ धातु से बना है, जिसका अर्थ है-धारण करना । किसी भी वस्तु का मूल तत्त्व है-उस वस्तु को धारण करना । इसीलिए वही उसका धर्म है । मानव अपने जीवन में गुण और क्षमताओं के अनुरूप आचरण करता है । वही उसका धर्म है । इस प्रकार आत्मा से आत्मा को देखना, आत्मा को आत्मा से जानना ।

आत्मा का आत्मा में स्थित होना ही धर्म है । ज्ञान, दर्शन, आनन्द, शक्ति का योग धर्म है । धर्म का अर्थ है: अज्ञात सत्ता की प्राप्ति । मानव का कल्याण, उचित-अनुचित का विवेक ही धर्म है ।

धर्म के जो प्रमुख लक्षण हैं, उनमें प्रमुख हैं:

1. वेद निर्धारित शास्त्र प्रेरित कर्म ही धर्म है ।

2. कल्याणकारी होना धर्म का प्रधान लक्षण है ।

3. धर्म की उत्पत्ति सत्य से होती है ।

4. दया और दान से इसमें वृद्धि होती है ।

5. क्षमा में वह निवास करता है ।

6. क्रोध से वह नष्ट होता है ।

7. धर्म विश्व का आधार है ।

8. जो धर्म दूसरों को कष्ट दे, वह धर्म नहीं है ।

9. पराये धर्म का त्याग ही कल्याणकारी है ।

10. धर्म ऐसा मित्र है, जो मरने के बाद मनुष्य के साथ जाता है ।

11. धर्म सुख-शान्ति का एकमात्र उपाय है ।

12. धर्म भारतीय धर्मो का स्वरूप है ।

3. भारतीय धर्मोका स्वरूप:

धर्म प्रधान भारतीय समाज की विभिन्नता ही उसकी प्रमुख विशेषता रही है । विश्व के प्रमुख सभी धर्म भारत में विद्यमान हैं । एम॰ए॰ श्रीनिवास के अनुसार: ”भारतीय जनगणना में दस विभिन्न धार्मिक समूह बताये गये हैं: हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी तथा अन्य जनजातियों के धर्म व गैर जनजातियों के अन्य धर्म ।

भारत की जनसंख्या में हिन्दू 82.64 प्रतिशत, तो मुसलमान 12 प्रतिशत, ईसाई 3 प्रतिशत, सिख 2 प्रतिशत, बौद्ध 0.81 प्रतिशत, जैन 0.50 प्रतिशत, पारसी 001 प्रतिशत हैं । शेष धर्मो के अनुयायियों का प्रतिशत कम है । यहां हम सर्वप्रथम हिन्दू धर्म की विशेषताओं को देखते हैं, तो ज्ञात होता है कि

(क) हिन्दू धर्म:

वास्तव में बहुत जटिल धर्म है । यह भारत का सबसे प्राचीन धर्म है । हिन्दू धर्म में किसी अन्य धर्म की भांति किसी धार्मिक एक गन्धों की तरह न एक पैगम्बर है न एक ईसा है ।

कुछ निश्चित धार्मिक विधियों एवं पूजन विधियों पर आधारित धार्मिक समुदाय का धर्म नहीं है । एक तरफ हिन्दू धर्म प्रकृति की प्रत्येक वस्तु की मौलिकता को प्रकट करता है, तो दूसरी ओर वह समाज और व्यक्ति तथा समूह की आचरण सभ्यता को प्रकट करता है ।

यह विस्मयकारी विविधताओं पर आधारित है । कहीं शाकाहारी हिन्दू है, तो कहीं मांसाहारी हिन्दू है । एक पत्नीव्रत आदर्श संहिता है, तो कहीं बहुपत्नी व्रत है । हिन्दू धर्म में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं, जिनका अपना अलग इतिहास है ।

उसके सरकार एवं विधि-विधान है । सबकी निजी, आर्थिक एवं सामाजिक विशेषताएं हैं । उनमें सर्वप्रथम है: वैष्णव धर्म, जिसमें शंकराचार्य रामानुज, माधवाचार्य, वल्लभाचार्य. चैतन्य, कबीर, राधास्वामी प्रचलित मत सम्प्रदाय हैं ।

दूसरा शैव धर्म है । इसमें 63 शैव सन्त हैं, शाक्त मत भी हैं । ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन, अरविन्द योग, आचार्य रजनीश, आनन्द मूर्ति जैसे मत प्रचलित हैं । हिन्दू धर्म सहिष्णु धर्म है ।

(ख) इस्लाम धर्म:

यह भारत में अरब भूमि से आया । हजरत मोहम्मद ने 571-632 में अरब में इस्लाम धर्म का प्रतिपादन किया । ऐसी मान्यता है कि ईश्वरीय पुस्तक कुरान के मूल पाठ को सातवें स्वर्ग से अल्लाह के हुक्म से जब्रील ने उसे मोहम्मद साहब को सुनाया और उन्होंने उसे वर्तमान रूप में प्रचलित किया ।

भारत में इस्लाम का पदार्पण अरब सागर के मार्ग मुस्लिम व्यापारियों के माध्यम से आया । प्रारम्भ में लोगों के विरोध के बाद मोहम्मद साहब इसे मक्के से मदीने की ओर ले गये ।

जहां 24 सितम्बर 622 से हिजरी संवत् प्रारम्भ हुआ । भारत में 1526 में मुगल वंश के शासकों ने इसका प्रचार किया । इरलाम मूर्तिपूजा को नहीं मानता । अल्लाह के सिवा इनका कोई भगवान् नहीं, मोहम्मद साहब इसके पैगम्बर हैं ।

दिन में पांच बार मक्के की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ना, शुक्रवार को सार्वजनिक नमाज में भाग लेना, अपनी आमदनी का ढाई प्रतिशत दान करना, जीवन में एक बार हज करना, इसके प्रमुख नियम हैं ।

अब इस धर्म का भारतीयकरण हो चुका है । इस धर्म में अधिकांश लोग परम्परावादी धार्मिक सिद्धान्तों का अनुकरण करते हैं ।

(ग) ईसाई धर्म:

भारतीय समाज का तीसरा प्रमुख धर्म है ईसाई । इस धर्म के प्रवर्तक ईश्वर पुत्र ईसा मसीह थे । ईसा धनिकों के अत्याचार और अहंकार के विरोधी थे । प्रेम, सदाचार और दुखियों की सेवा ही इस धर्म का मुख्य सन्देश है ।

मानव-समता में उनका अदूट विश्वास है । अपने शत्रुओं को क्षमा कर बिना किसी भेदभाव के सबकी सेवा ये ईसा मसीह के मूलमन्त्र थे । उनके विचार से गरीब, सताये हुए, अनपढ़ लोग सौभाग्यशाली हैं; क्योंकि स्वर्ग का राज्य उनके लिए सुरक्षित है ।

अमीर और अत्याचारी अभागे हैं; क्योंकि पापों के कारण उन्हें नरक के दुःख भोगने पड़ेंगे । उनके सन्देश उस वक्त के यहूदी पुरोहितों को सहन नहीं हुए । अत: रोमन प्रशासक ने उन्हें कूस पर कीलों से जड़कर मारने का दण्ड दिया ।

कहा जाता है कि यीशु के 12 धर्माचारियों में से एक सेंट थामस भारत आये थे । उन्होंने इस धर्म का प्रचार किया । ईसाई धर्म विभिन्न मतों का एक संगठित धर्म

है ।

चर्च संगठन में धर्माधिकारियों के स्पष्ट पर सोपान है: ईसाई पादरियों और ननों ने वास्तव में समाज सेवा के बहुत कार्य किये । ईसाई धर्म कैथलिक तथा प्रोस्टैण्ट-दो सम्प्रदायों में विभक्त है । भारतीय सांस्कृतिक व राजनीतिक धारा के साथ जुड़कर इस समुदाय ने काफी योग दिया ।

(ध) सिक्स धर्म:

सिक्स धर्म भी भारतीय भूमि की उपज है । इस धर्म के संस्थापक गुरा नानक देव ही {1469-1539} हिन्दू खत्री परिवार में जन्मे थे । उन्होंने ओंकार परमेश्वर की सीख

दी । वे जाति-पाति के घोर विरोधी थे ।

आडम्बरपूर्ण कर्मकाण्डों में उनका विश्वास् नहीं था । अनिश्चयों और निराशा से भरे हुए समय में उनकी सीधी-सच्ची वाणी जनभाषा थी, जिसमें शाश्वत मूल्यों का उद्‌घोष था ।

गुरुनानक के बाद 9 अन्य गुरुओं ने उनकी इस परम्परा को आगे बढ़ाया । वे गुरु हैं: अंगद, अमरदास, रामदास, अर्जुन, हरगोविन्द, हरराय, हरकिशन, गुरा तेगबहादुर एवं गुरा गोविन्द सिंह ।

इस धर्म ने पर्दाप्रथा, सतीप्रथा का विरोध किया । इनके धार्मिक कार्यो से तत्कालीन मुगल बादशाह रुष्ट हो गये । 605 में उन्हें यातनाएं देकर शहीद कर दिया । गुरा अर्जुन देव का ऐसा बलिदान सिक्स इतिहास में एक नया मोड़ था ।

गुरा हरगोविन्द ने सिक्सों को सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सशस्त्र होने की सलाह

दी । उन्होंने कई सफल युद्ध किये । औरंगजेब ने नवें गुरु तेगबहादुर को 1675 में दिल्ली में शहीद कर दिया ।

उनके पुत्र एवं दसवें गुरु गोविन्द सिंह ने अधर्म के विरुद्ध सिक्स समुदाय को तैयार किया । 1699 में खालसा पंथ का उदय हुआ । पंचपियारों को खालसा में दीक्षित किया गया ।

तभी से पांच ककार धारण करने की प्रथा चली । प्रत्येक सिक्स के लिए केश, कंघा, कटार, कड़ा और कच्छा धारण करना अनिवार्य माना गया । गुरा गोविन्द सिंह ने धर्म के रक्षार्थ अपने चार पुत्रों का बलिदान दिया और किसी व्यक्ति को गुरा बनाने की परम्परा समाप्त की ।

उन्होंने गुरु ग्रन्ध साहब को गुरु मानते हुए शीश नवाने का आदेश दिया । वे अन्याय, अत्याचार व अनीति के विरोधी थे । सिक्स धर्म की प्रमुख शिक्षाएं हैं-निराकर ईश्वर की उपासना, उसी का नाम-जाप, सदाचारी जीवन, मानव सेवा ।

यह धर्म आत्मा की अमरता तथा पुनर्जन्म में विश्वास करता है । सामूहिक प्रार्थना एवं सामूहिक भोज (लंगर) इसकी विशेषता है । इस धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय हैं: नानक पंथी, निरंकारी, निरंजनी, सेवा-पंथी ।

(ड.) बौद्ध धर्म:

बौद्ध धर्म पूर्वी एशिया व द॰ एशिया तक फैला । इसके प्रणेता गौतम बुद्ध शाक्य वंश के महाराजा शुद्धोधन के पुत्र थे । उनका कार्य ईसा से छह शताब्दी पूर्व है । उनका नाम सिद्धार्थ भी था ।

बचपन से ही उनका हृदय मानव दुःखों, जैसे-बुढ़ापा, बीमारी तथा मृत्यु के प्रति करुणा से भरा था । मानव मात्र को इन दुःखों से छुटकारा दिलाने के लिए वे अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल तथा राजसी वैभव को छोड़कर चल दिये । छह वर्षो के कठोर तप से उनका हृदय सत्य के प्रकाश से भर गया ।

महात्मा बुद्ध ब्राह्मणवाद के कर्मकाण्डों और पशुबलि के घोर विरोधी थे । वे मध्यममार्गीय थे । दुःखों का मूल उन्होंने तृष्णा या इच्छा को बताया । इच्छा का अन्त करना दुःखों से मुक्त होना है ।

उन्होंने सम्यक विचार, सम्यक वाणी और सम्यक आचरण को मुक्ति का द्वार

बताया । प्राणी मात्र पर दया, प्रेम, सेवा और क्षमा को मानव का सच्चा धर्म

बताया ।

धर्म प्रचार के लिए उन्होंने भिक्षुओं को संगठित किया, जिसे अशोक जैसे महान सम्राट ने स्वीकारा । नगरवधू आम्रपाली भी इसमें सम्मिलित हुई । सत्य, अहिंसा, प्राणी मात्र पर दया का सन्देश देते हुए 80 वर्ष की आयु में 488 ई॰ पूर्व उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया ।

निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों-महायान और हीनयान-में बंट गया । आज इस धर्म के अनुयायी लंका, वियतनाम, चीन, बर्मा, जापान, तिबत, कोरिया, मंगोलिया, कंपूचिया में हैं ।

आठवीं शताब्दी में आते-आते ही इस धर्म का लोप हो गया । इसके कई कारण हैं । आज भी यह धर्म अपने सिद्धान्तों और आदर्शो के कारण कायम है ।

(च) जैन धर्म:

इस धर्म के संस्थापक वर्द्धमान महावीरजी वैशाली के क्षत्रिय राजवंश में पैदा हुए थे । वे गौतम बुद्ध के समकालीन और अवस्था में उनसे कुछ बड़े थे । उन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में गृहत्याग किया और वर्ष के कठोर तप के बाद सत्य का प्रकाश प्राप्त किया । तभी से वे जिन कहलाये ।

जैन धर्म के में तीर्थकर हो चुके हैं । महावीर 24वें तीर्थकर थे । इस धर्म के पहले तीर्थकर ऋषभदेव हैं । इस धर्म के अनुसार कैवल्य मोल प्राप्त करने के विविध मार्ग हैं, जिसे तीन रत्न कहा जाता है ।

सम्यक विचार, सम्यक ज्ञान, सम्यक आचरण इस धर्म का सार है । “अपना कर्तव्य करो, जहां तक हो सके, मानवीय ढग से करो” । दिगम्बर और श्वेताम्बर दो सम्प्रदायों में बंटे हुए इस धर्म में दिगम्बर साधु दिशा को वस्त्र मानकर वस्त्र नहीं पहनते ।

श्वेताम्बर श्वेत वस्त्र धारण करते हैं । जीवों के रूप में और देवताओं के रूप में आत्मा जन्म-मरण के चक्र में फंसी हुई है । इससे छुटकारा पाना ही मोक्ष है ।

(छ) पारसी धर्म:

पारसी धर्म भी भारतभूमि पर बाहर से आया है । पारसियों का आगमन भारत में वीं सदी में हुआ था । ये ईरान के मूल निवासी हैं । जब ईरान पर मुसलमानों का कब्जा हो गया, तो अनेक पारसी भारत आ गये । इस धर्म के संस्थापक जरस्थूस्त्र हैं ।

यह धर्म वैदिक धर्म की भांति अति प्राचीन है । कुछ विद्वानों के अनुसार जरज्यूस्त्र ईसा से 5000 वर्ष पूर्व हुए थे । ऋग्वेद और इनकी धार्मिक पुस्तक अवेस्ता में अनेक बातों में समानता है ।

इस धर्म के अनुसार अहुर्मज्दा ही एकमात्र ईश्वर है । वही विश्व के सूष्टा हैं । जीवन नेकी तथा बदी, पुण्यात्मा तथा पापात्मा दो विरोधी शक्तियों के संघर्ष में विकसित होता है । अन्त में विजय पुण्यात्मा तत्त्व की होती है ।

अहुर्मज्दा पवित्र अग्नि का प्रतीक है, जो शुद्धता और उज्जलता का प्रतीक है । इसीलिए पारसी अग्नि की पूजा करते हैं और मन्दिर के रूप में अग्निगृह इआतश-बहराम का निर्माण करते हैं ।

इस धर्म के त्रिविध मार्ग-अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म-हैं । पारसी धर्म संन्यासी जीवन को नहीं मानता । भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन तथा औद्योगिक विकास में इस धर्म का बड़ा हाथ रहा है ।

(ज) यहूदी धर्म:

यहूदी धर्म एक प्राचीन धर्म है । इनका विश्वास है कि इनके पैगम्बर मूसा थे, जो प्रथम धर्मवेत्ता माने जाते हैं । इनके प्रथम महापुरुष अब्राहम ने ईसा से 1000 पहले यहूदी कबीले के स्थान पर अपना मूल स्थान उर छोड़ दिया ।

उनके शक्तिशाली सम्राटों द्वारा गुलाम बनाये जाने पर हजरत मूसा ने ईश्वरीय आदेश के अनुसार उन्हें दासता से मुक्त कराया और दूध, शहद से भरपूर धरती पर

बसाया ।

हजतर मूसा को ही जवोहा अथवा यवोहा सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाता है । उन्हें दस आदेश प्राप्त हुए थे । यहूदियों का धार्मिक ग्रन्ध हिन्दू बाइबिल अथवा तौरत

है ।

29 पुस्तकों के इस संग्रह को पुराना अहमदनामा भी कहते हैं । यहूदी धर्म में नैतिक जीवन को विशेष महत्त्व दिया गया है । सत्याचरण वाला व्यक्ति ही स्वर्गारोहण का अधिकारी होता है । यहूदी धर्म संन्यास और आत्मपीड़ा के विरुद्ध है । जेरूसलम यहूदियों का पवित्र नगर है ।

4. उपसंहार:

इस प्रकार भारतभूमि पर विश्व के लगभग सभी धर्मो के समुदाय बसते हैं । समय के साथ-साथ उनका भारतीयकरण भी हुआ । सभी धर्मो में समान धार्मिक नियम, आपसी प्रेम, सदभाव, भाईचारे, सुविचार, सत्कर्म पर बल दिया गया है ।

धर्मनिरपेक्षता हमारी पहचान है । वर्तमान में कुछ संकीर्णतावादी विचारधारा के लोग सम्प्रदायवाद को बढ़ावा दे रहे हैं । हमें इनसे बचना है; क्योंकि सच्चा धर्म मानवता का है, जो हमें पतन से रोकता है ।


Hindi Essay # 3 भारत की महान दार्शनिक परम्पराएं |India’s Great Philosophical Traditions

1. प्रस्तावना ।

2. दर्शन क्या है?

3. दर्शन के विभिन्न स्वरूप ।

4. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

भारत एक विशाल देश है । इस धर्मप्रधान देश के समाज में दार्शनिकता का भाव विभिन्न रूपों में दिखाई पड़ता है । भारत में जितने धर्म प्रचलित हैं, उनका आधार आस्तिकता एवं, नास्तिकता है ।

भारतीय-धर्मों में दर्शन का प्रभाव अपने विशिष्ट स्वरूप में भी दिखाई पड़ता है । भारतीय दर्शन से उपजी संस्कृति अपना अद्वितीय स्थान रखती है ।

2. दर्शन क्या है?

दर्शन शब्द की उत्पत्ति दृश धातु से हुई है, जिसका अर्थ होता है-देखा जाये, अर्थात् जिसके द्वारा संसार वस्तुजगत् का ज्ञान प्राप्त कर सके तथा जिसके द्वारा उस परम तत्त्व को देखा जाये, वही दर्शन है ।

एक प्रकार से दर्शन मानव मन की जिज्ञासा और आश्चर्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, जिसके द्वारा क्यों, कब, कहां, कैसे ? इन प्रश्नों के तथ्यात्मक एवं बौद्धिक उत्तर जानना तथा उसके अन्तिम यथार्थ को जानने का प्रयास की दर्शन है ।

दर्शन आदर्शों से शासित होकर व्यक्ति जीवन, जगत् आदि के स्वरूप का अध्ययन करता है । बौद्धिकता से अनुशासित होने के कारण दर्शन और विज्ञान में तात्विक भेद नहीं है ।

वैज्ञानिकों के निष्कर्ष सर्वत्र समान होते हैं, जबकि जगत् के निरपेक्ष अपार्थिव स्वरूप में विवेचन में हम विमिन, दार्शनिक परिणामों में पहुंचते हैं । दर्शन मनुष्य की क्रियाओं की व्याख्या एवं श्लोकन करता है ।

डॉ॰ शम्यूनाथ पाण्डेय के अनुसार: ”धैर्य और सहिष्णुता गधे में ही है, किन्तु गधे में उक्त गुण स्वभाव एवं प्रकृति का अंग है । जबकि यति में यह गुण उसके जीवन दर्शन के कारण है । दर्शन एवं संस्कृति का घनिष्ठ सम्बन्ध है । दर्शन के बिना संस्कृति अंधी है । दर्शन मानव स्वभाव का निर्माता है ।”

3. दर्शन का स्वरूप:

भारतीय जीवन दर्शन का स्वरूप हमें जिन दार्शनिक परम्पराओं में मिलता है, उनमें प्रमुख हैं:

(क) वेद दर्शन:

भारतीय दर्शन का मूल आधार वेद है, जो आस्तिकतावादी दर्शन के अन्तर्गत सर्वमान्य एवं शाश्वत आधार है । वे मानव को प्रकृति का अंग मानते हैं । इसी आधार पर प्रकृति के विषय में हमारा जीवन दर्शन निर्धारित होता है ।

यदि ऐसा नहीं होता, तो हम न तो प्रकृति के रहस्यों को जान पाते और न ही पुनर्जन्म का विचार होता, न ही कर्म महत्त्वपूर्ण होता ।

(ख) उपनिषद दर्शन:

उपनिषदों में सत्य को परमब्रह्म कहा गया है । उसी की अभिव्यक्ति संसार है । वह अजन्मा और अमर है । उसका अस्तित्व शरीर से पृथक् है, जो कि नश्वर है । ज्ञान के प्रकाश में ही उसे समझा जा सकता है ।

(ग) स्मृति एवं गीता दर्शन:

स्मृतियों को हिन्दू समाज के सामाजिक विधि-विधानों का ग्रन्थ कहा जाता है । इसमें कर्म, पुनर्जन्म, पुरुषार्थ एवं संस्कारों का वर्णन है, जिनके द्वारा मानव जीवन पूर्णता को प्राप्त करता है । वर्णाश्रम व्यवस्था इसी दर्शन का अंग है ।

गीता दार्शनिक स्तर पर हिन्दुओं की चरम उपलब्धि है । परमात्मा रूपी कृष्ण तथा अर्जुन रूपी आत्मा को निष्काम कर्म के द्वारा मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं । गीता में स्पष्ट कहा गया है कि अनासक्त भाव या निष्काम भाव से कर्म करना ही मानव कल्याण है, जीवन की सार्थकता है ।

(घ) षडदर्शन:

भारतीय जीवन दर्शन में षडदर्शन का प्रमुख स्थान है । दर्शन 6 हैं: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा, उत्तर मीमांसा ।

{अ} न्याय दर्शन:

इसकी रचना 300 ईसा पूर्व गौतम ऋषि ने अपने न्याय सूत्र में की थी । उनके अनुसार-समस्त अध्ययन का आधार तर्क है । इसमें पुनर्जन्म की अवधारणा को मान्य किया गया है । ब्रह्म एव ईश्वर में विश्वास तथा मोक्ष के लिए ज्ञान आवश्यक माना गया है ।

{ब} वैशेषिक दर्शन:

इसकी रचना 300 ईसा पूर्व कणाद ऋषि ने की थी । उनके अनुसार जगत् की उत्पत्ति परमाणुओं की अन्त-क्रिया से होती है, जो कि शाश्वत एव अविनाशी है । परमाणु स्वयं उत्पन्न है । सारी संस्कृति और सारी प्रकृति परमाणु की विभिन्न अभिक्रियाओं से बनी है ।

यह जगत् परमाणुओं के संयोग से उत्पन्न है, विकसित है और प्रलय से नष्ट होता है । बाद में यही प्रक्रिया चलती रहती है । परमाणु न तो उत्पन्न किये जाते हैं, न ही नष्ट किये जाते हैं । इसीलिए वैशेषिक क्रियाओं के द्वारा जगत् की प्रक्रियाओं को समझने के लिए किसी अलौकिक जीवों के अस्तित्व या विश्वास की आवश्यकता नहीं है ।

{स} मीमांसा दर्शन:

400 ईसा पूर्व जेमिनी ने मीमांसा दर्शन प्रतिपादित किया । यह एक व्यावहारिक दर्शन है । वेदों को प्रमाण मानते हुए उसके केन्द्र में कर्मकाण्ड, उपासना और अनुष्ठानों के स्वरूप और नियम हैं । यह पूर्व मीमांसा दर्शन है । इसमें देवताओं की उपासना के साथ-साथ परमसत्य का हल ढूँढने की चेष्टा नही है ।

उत्तर मीमांसा की रचना बादरायण ऋषि ने की थी । चार अध्यायों में विभक्त इस दर्शन के 555 सूत्र हैं । यह दर्शन अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष पर बल देता है । इसके चार अध्यायों में ब्रह्मा, प्रकृति, विश्व के साथ अन्य जीवा के सम्बन्ध, ब्रह्म विद्या से लाभ मृत्योपरान्त आत्मा का भविष्य बताया गया है ।

{द} वेदान्त दर्शन:

500 ईसा पूर्व पाणिनी ने इसका प्रतिपादन किया । इस प्रत्ययवादी दर्शन में समस्त सृष्टि को एक ही ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है । दृश्य जगत् उस ब्रह्म की प्रतिछाया मात्र है । इसके पांच समुदाय हैं, जिनके प्रर्वतक हैं: शंकर, रामानुज, मध्य, वल्लभ तथा निबार्क । शंकर का कार्ताकाल वीं-9वीऐ शताब्दी का है । उन्होंने अद्वैतवाद की स्थापना की ।

उनके अनुसार पर ब्रह्म से उत्पन्न संसार एक भ्रम है, मिथ्या है, अयथार्थ है, माया है, ब्रह्म ज्ञान मुक्ति का मार्ग है । नवीं सदी में रामानुज के दर्शन को विशिष्टाद्वैतवाद, वल्लभ के दर्शन को शुद्धाद्वैतवाद, माध्याचार्य के दर्शन को द्वैतदर्शन, निबार्क के दर्शन को द्वैताद्वैत दर्शन कहा गया । वेदान्त और मीमांसा दर्शन एक दूसरे के पर्याय हैं ।

(इ) जैन दर्शन:

ईश्वर की अपेक्षा न रखने वाले दर्शनों में जैन दर्शन आत्म तत्त्व को मानता है । जैन धर्म दुःखों की निवृति को परम सुख की प्राप्ति मानता है । जैन धर्म तीन रत्नों-सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान व सम्यक चरित्र के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति पर बल देता है ।

इसकी प्राप्ति के लिए पांच व्रतों का पालन-अहिंसा, असत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह-प्रमुख है । जैन धर्म कर्म के सिद्धान्त पर विश्वास करता है । गृहस्थ जीवन को महत्त्व देते हुए भी वह संन्यास को श्रेयस्कर समझता है ।

(ई) बौद्ध दर्शन:

बौद्ध दर्शन में चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन है-प्रथम, संसार दुःखमय है । द्वितीय दुःखों का कारण है । तृतीय, वह कारण है तृष्णा, काम-तृष्णा, भव-तृष्णा । चतुर्थ, यदि दुःखों का कारण है, तो उसका निरोध भी किया जा सकता है ।

बौद्ध दर्शन अति दुःखवाद, अति कठोरवाद, अति सुखवाद से अलग मध्यम मार्ग की स्थापना करता है । इस अष्टांगिक मध्यम मार्ग में सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प. सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक प्रयत्न, सम्यक समाधि, सम्यक, स्मृति आते हैं । बौद्ध धर्म में स्त्रियों का प्रवेश सम्मिलित था ।

(ड.) चार्वाक या भौतिकतावादी दर्शन:

यह चार्वाक शब्द चव धातु से बना है, जिसका अर्थ है चबाना अर्थात् यह उन व्यक्तियों का दर्शन है, जो खाने-पीने, मौज उड़ाने में विश्वास रखते हैं । यह भौतिकतावादी दर्शन है, जो इन्द्रिय सुख या इन्द्रिय ज्ञान को सत्य मानता है ।

इसके अनुसार दृश्य जगत ही सत्य है । जीवन में भोग ही एकमात्र पुरुषार्थ है, अर्थात जब तक जीना है, सुखपूर्वक जीना है । ऋण लेकर भी घी पीना है । चिता में जला देने के बाद भी जीवन का पुनरागमन कैसे हो सकता है ? न कोई स्वर्ग है न कोई नरक है । ना कोई मोक्ष है । वेद मिथ्या है ।

4. उपसंहार:

भारत की दार्शनिक परम्पराओं में रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, दयानन्द, राजा राममोहन राय, टैगोर, अरविन्द योगी, साई बाबा, आचार्य रजनीश आदि के दर्शन प्रमुख हैं । इस तरह स्पष्ट है कि भारतीय दर्शन विश्व का विशिष्ट दर्शन है, जो जीव जगत्, ब्रह्म, संसार की व्याख्या तर्कपूर्ण ढग से प्रस्तुत करता है । मनुष्य अपनी समस्याओं का समाधान इसमें पा सकता है ।


Hindi Essay # 4 भरतीय कलाएं विकास एवं उनका स्वरूप |  Indian Art Development and their Nature

1. प्रस्तावना ।

2. भारतीय कलाओं की विरासत एवं विकास ।

वास्तुकला ।

चित्रकला ।

संगीतकला ।

नृत्यकला ।

नाट्‌यकला ।

साहित्यकला ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

कला मानव जीवन की अभिव्यक्ति है । यह मानव अभिवृतियों की रागात्मक वृत्ति है । भर्तृहरि ने नीति दशक में लिखा है:

साहित्य, संगीतकला, विहीन: साक्षाल्पशु: पुच्छविशाहीन: । तृणन्न खादान्नपि जीवमानस्तद् भागधेयं परमशूनाम: ।।

अर्थात ”जो मनुष्य साहित्य, संगीत व कला से विहीन हैं, वे पूंछ और सींग से विहीन पशु ही हैं । परन्तु वे घास न खाकर जीवित रहते हैं । यह उन पशुओं का परम सौभाग्य है ।”  कला किसी भी संस्कृति एवं विचारधारा ड्रा प्रतीक है, उसकी पहचान है । भारतीय संस्कृति में कला की समृद्ध विरासत रही है । वह सत्यम, शिवम, सुन्दरम के आदर्श पर आधारित है । भारतीय कला की अत्यन्त विपुल एवं व्यापक विरासत रही है, जो विश्व में बेजोड़ है ।

2. भारतीय कलाओं की विरासत एवं बिकास:

भारतीय कलाओं की विरासत संस्कृत की तरह प्राचीन है तथा विविधताओं से भरी  है । उनमें गतिशीलता है, लयबद्धता है । वह अनुपम है । भारतीय कलाओं के स्वरूप में वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला, नृत्यकला एवं साहित्यकला प्रमुख वास्तुकला-किसी भी महान् संस्कृति की पहली कला स्थापत्य कला, अर्थात वास्तुकला है ।

वास्तुकला चाहे कोई झोपड़ी हो या राजप्रासाद, वह तो रभूल यथार्थ से सम्बन्धित है । भारत में वास्तुकला का इतिहास 700-800 ईसा पूर्व तक से सम्बन्धित है । मोहनजोदड़ो और हड़प्पा एक नगरीय विकसित सभ्यता थी ।

उसकी वास्तुकला सुस्पष्ट एवं उच्चस्तरीय थी । बड़े नगरों के दो मुख्य भाग में दुर्ग थे, जिसमें नगराधिकारी रहते थे । शहर के निवासियों के लिए जो भवन थे, उनमें पक्की ईटों का इस्तेमाल होता था । इसके साथ ही लकड़ी के भवनों का प्रचलन भी पाया जाता था ।

मौर्यकाल {324-187} में लकड़ी की इमारतों के स्थान पर पत्थर की इमारतों की शुराआत होती है । व्यवस्थित वास्तुकला का इतिहास मौर्यकाल का है । इसमें चट्टानों को काटकर कन्दराओं का निर्माण होता था । बौद्धकालीन वास्तुकला में २लूप प्रमुख थे । रतूपों में वैशाली, सांची, सारनाथ, नालन्दा आदर्श नमूने थे ।

इसमें बहुत की सुन्दर तराशे हुए चार द्वार व सुन्दर मन्दिर सांची के थे, जिसका मंच अर्द्धवृत्ताकर संरचना का है । जंगला का प्रयोग प्रकाश और वायु के लिए था । द्रविड शैली के मन्दिर आयताकार होते थे, जिनके शिखर पिरामिड के रूप में होते थे ।

यह क्रमश: बीच की ओर छोटा होता जाता है । शीर्ष भाग में एक गुम्बदाकार स्तूपिका होती थी, जिसमें बने गवाक्ष व गलियारे अदूभुत थे । कांचीपुरम एवं महाबलीपुरम के मन्दिर प्रसिद्ध थे । तंजौर का वृहदीश्वर मन्दिर द्रविड शिल्पकला की सर्वोत्तम कृति थे ।

बेसर शैली भारतीय वास्तुकला का सुन्दर मापदण्ड है । यह नागर और द्रविड शैली का मिश्रण है । दक्षिणापथ में मन्दिर इसी शैली में बने हैं । देवगढ़ का दशावतार मन्दिर, उदयगिरि का विष्णु मन्दिर इस शैली के प्रसिद्ध मन्दिर हैं ।

इस्लामी वास्तुकला:

अरबी, ईरानी शैली मिश्रित यह वास्तुकला 1191 से 1707 तक चरमोत्कर्ष पर थी । इसमें मस्जिद, मकबरों, मदरसों, मीनारों का निर्माण हुआ । फतेहपुर सीकरी का भवन, बुलन्द दरवाजा, सलीम चिश्ती की दरगाह, आगरे का लालकिला, आगरे का ताजमहल अद्‌भुत नमूने हैं ।

इस्लामी वास्तुकला:

17वीं शताब्दी की इस वास्तुकला में यूरोपीय शैल । के गिरजाघर मिलते हैं । सिक्स वास्तुकला-सिक्स गुरुद्वारे इसका अद्‌भुत नमूना हैं । 1588-1601 में बना हरमन्दर साहब का प्रसिद्ध अमृतसर रचर्ण मन्दिर है ।  यह 150 वर्गफुट के पवित्र सरोवर की बीच बना तिमंजिला भवन है । प्रथम मंजिल में गुरुग्रंथ साहब हैं । द्वितीय मंजिल में शीशमहल है । तृतीय मंजिल में गुम्बद की छतरियां हैं । इसमें समकालीन वास्तुकला सम्मिलित है ।

भारतीय मूर्तिकला:

भारतीय मूर्तिकला पत्थर, धातु और लकड़ी की है, जिस पर मुद्रा एवं भाव मूर्तियों को सजीव बनाते हैं । इसमें कुछ प्ररत्तर मूर्तियां हैं । ये मूर्तियां गांधार शैली की हैं । इसमें अधिकांश मूर्तियां विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य, शक्ति, जैन एवं बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं ।

चित्रकला:

मानवीय सौन्दर्य बोध की चरम अभिव्यक्ति चित्रकला में भी मिलती है । भारतीय संस्कृति में चित्रकला की इस समृद्ध परम्परा में महर्षि वात्सायन के प्रसिद्ध कामसूत्र में 64 कलाओं का वर्णन मिलता है । चित्रकला में रेखाओं और रंगों के प्रयोग द्वारा वस्त्र, लकड़ी, दीवार व कागज पर चित्र बनाये जाते थे ।

प्रागैतिहासिक काल में कई गुहा चित्र भी मिलते हैं, जिनमें भीमबेटका के मानव व पशु-पक्षी के लाल रंगों के चित्र हैं । द्वितीय चरण में गुप्तकाल के अजंता, एलोरा और बाघ गुफाओं के भित्तिचित्र मिलते हैं । यह विश्वकला की अनुपम चित्रशाला है ।

यहा प्राकृतिक सौन्दर्य पर आधारित वृक्ष, पुष्प, नदी एव झरनों के चित्र हैं । वहीं अप्सराओं, गन्धवों एव यक्षों के चित्र हैं । बुद्ध और उनके विभिन्न रूपों के जातक कथाओं के चित्र भी मिलते हैं जिसमें नीले, सफेद, हरे, लाल, भूरे रंगों का काल्पनिक रग संयोजन अदभुत सौन्दर्य को प्रकट करते हैं ।

इन चित्रों में करुणा, प्रेम, लज्जा, भय, मैत्री, हर्ष, उल्लास, घृणा, चिन्ता आदि सूक्ष्म भावनाओं का चित्रण है । गुप्तोत्तर काल की चित्रकला में लघु चित्रकला शैली का विकास हुआ । यह पूर्वी और पश्चिमी सम्प्रदायों से मिश्रित राष्ट्रीय शैली थी । इस शैली के चित्रों में अनन्त विविधता है ।

बंगाल, बिहार, नेपाल गे 11 वीं एवं 21वीं शताब्दी में विकसित हुए इन चित्रों में वस्त्र एवं अलंकारों से प्रादेशिकता का प्रभाव झलकता है । मुगलकालीन चित्रकला में परशियन तथा भारतीय दोनों प्रभाव परिलक्षित होते है । अकबर, जहांगीर तथा शाहजहाँ ने चित्रों के प्रति गहरा लगाव प्रस्तुत करते हुए पशु-पक्षियों आदि के चित्र बनवाये ।

इन चित्रों में भावहीन चेहरे और निश्चल पशु-पक्षियों के चेहरे देखने को मिलते हैं । राजस्थानी चित्रकला मुगल एवं पश्चिमी परम्परा से मिश्रित एक स्वतन्त्र कला है । हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में पहाड़ी आकृति, पृष्ठभूमि रेखा और रंग की दृष्टि से काफी विविधताएं हैं । इसमें कृष्ण लीलाओं तथा राग-रागनियों का मिश्रण है ।

कागड़ा शैली के बाद विकसित मराठा शैली की भी अपनी विशिष्ट पहचान है । चित्रकला में पटना एवं मधुबनी शैली भी उल्लेखनीय है । आधुनिक युग में यूरोपीय प्रभाव के कारण नयी शैली विकसित हुई । रवीन्द्रनाथ टैगोर, नन्दलाल बोस, जामिनी राय, अमृता शेरगिल, जतिन दास, मकबल फिदा हुसैन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं ।

संगीतकला:

भारतीय संगीतकला का जन्म वेदों से हुआ है । नाद, अर्थात् संगीत को ब्रह्म कहा गया है । इसीलिए उसकी तरंगें हृदय को छूती हैं । भारतीय संगीत सामवेद से जन्मा है । लोकगीतों तथा शास्त्रीय संगीत में विकसित एवं परिष्कृत भारतीय संगीत का आधार राग है ।

राग, रबर, माधुर्य की एक ऐसी योजना को कहते हैं, जिसमें स्वरों को परम्परागत नियमों में बांधा गया है । सात सुरों से प्रारम्भ हुए संगीत में उषाकाल, प्रभात, दोपहर, सच्चा, रात्रि और अर्द्धरात्रि के अनुसार रागों का विभाजन है ।

भारतीय संगीत में ताल का विधान अत्यन्त जटिल एवं विस्तृत है । इसमें विलम्बित, भव्य एवं दुत ताल प्रसिद्ध हैं । वर्गीकरण की दृष्टि से शास्त्रीय संगीत एवं सुगम संगीत दो पद्धतियां हैं । शास्त्रीय संगीत की मुख्य दो पद्धतियां हैं: हिन्दुस्तानी संगीत और कर्नाटकी संगीत । हिन्दुस्तानी संगीत में ध्रुपद, ठुमरी, ख्याल, टप्पा प्रसिद्ध हैं । इससे सम्बन्धित घराना में ग्वालियर, आगरा, जयपुर, किराना घराना है ।

ग्वालियर घराने के प्रसिद्ध संगीतज्ञ बालकृष्ण दुआ, रहमत खां हैं । आगरा घराने से रस्थन खां, फैयाज खां, जयपुर खां, किराना घराना से अछल करीम खां, अकुल वालिद खां हैं । कर्नाटक संगीत शैली में तिल्लाना, थेवारम, पादम, जावली प्रमुख हैं । कर्नाटक संगीत कुण्डली पर आधारित है ।

इसमें लहर की भांति उच्चावचन नियमित हैं । इसके अतिरिक्त विभिन्न गायन शैलियों में धमार, तराना, गजल, दादरा, होरी भजन गीत, लोकगीत इत्यादि हैं । संगीत की प्रमुख राग-रागनियों में भैरवी, भूपाली, बागश्री, भैरव, देस, बिलावल, यमन, दीपक, विहाग, हिण्डोली, मेघ आदि हैं ।

इसमें प्रयुक्त होने वाले वाद्य हैं: सारंगी, वायलिन, मृदंगम, नादस्वरम, गिटार, सरोद, संतूर, सितार, शहनाई, बांसुरी, तबला, वीणा, पखावज, हारमोनियम, जलतरंग आदि । प्रमुख वादकों में बाल मुरलीधरन, अमजद अली खां, शिवकुमार शर्मा, पण्डित रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, जाकिर हुसैन, अल्लारखा खा, हरिप्रसाद चौरसिया, रघुनाथ सेठ हैं ।

प्रमुख गायकों में चण्डीदास, बैजू बावरा, तानसेन, विष्णु दिगम्बर पलुरकर, विष्णुप्रसाद भातखण्डे, एम॰एम॰ सुबुलक्ष्मी हैं । इस प्रकार भारतीय संगीत वेदों से प्रारम्भ होकर बौद्धकाल मौर्य तथा शुंग काल में काफी विकसित हुआ ।  किन्तु कुषाणकाल में कनिष्क तथा समुद्रगुप्त के शासनकाल में अत्यधिक विकसित हुआ ।

अश्वघोष नामक महान संगीतज्ञ इसी काल में हुए । मध्यकाल में संगीत का स्वरूप स्पष्ट दिखाई पड़ता है । इसमें गजल, ख्याल, ठुमरी, कब्बाली आदि है । आधुनिक युग में भारतीय संगीत में कुछ पश्चिमी प्रभाव भी दिखता है । आधुनिक चलचित्रों के विकास ने इसे अधिक लोकप्रिय बना दिया है ।

शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत, लोकसंगीत के साथ-साथ पार्श्वगायन में नूरजहां, सुरैया, खुर्शीद, सहगल, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर, मुकेश, मन्नाडे, आशा भोंसले विश्व प्रसिद्ध हैं । वहीं गजल के क्षेत्र में जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, पंकज उधास, राजेन्द्र मेहता, नीना मेहता प्रसिद्ध हैं । भजन में पुरुषोत्तम दास जलोटा, अनूप जलोटा व शर्मा बसु प्रसिद्ध हैं ।

नृत्यकला:

नृत्यकला भारतीय संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अंग है । हरिवंश पुराण में उर्वशी, हेमा, रम्भा, तिलोत्तमा आदि देव नर्तकियों के नाम आते हैं । भारतीय नृत्यकला अति प्राचीन है । इसका समय ईसा की प्रथम शताब्दी के आसपास ही निर्धारित हो गया था ।

भारतीय नृत्यों में धर्म अभिव्यक्ति का प्रमुख आधार रहा है । इसमें सामाजिक जन-जीवन से जुड़े नृत्यों की परम्परा भी रही है । शास्त्रीय नृत्य में ताण्डव, भरतनाट्‌यम, कथक, कथकलि सम्मिलित हैं । भरतमुनि के नाट्‌यशास्त्र में संगीत, नृत्य एवं कविता का अद्‌भुत समन्वय मिलता है ।

इसका उद्देश्य मनुष्य में पवित्रता, सदाचार, मानव मूल्यों का संचार करना है । ये नृत्य कठिन साधना पर आधारित रहे हैं । इसके अतिरिक्त लोकनृत्यों में बिहू, नागा नृत्य, दोहाई, महारास, बसन्त रास, कुंज रास, उखल रास, सुआ ढाल, पंडवानी, डण्डा, करमा, कमा, लावणी, तमाशा, झाऊ, जात्रा, नौटंकी, यक्षगान, डांडिया, भांगड़ा, गिद्धा प्रमुख हैं ।

वैदिककाल में मेले में युवक-युवतियां नृत्य करते थे । नगरवधुएं अपने आमोद-प्रमोद के लिए नृत्य किया करती थीं । देवदासी के साथ-साथ सार्वजनिक नृत्यशालाएं प्रचलित थीं । मौर्य तथा कनिष्क के समय में नृत्यों का पुनर्जागरण हुआ ।

गुप्तकाल नृत्यकला का स्वर्ण युग था । मुगलकालीन नृत्यकला दरबारों तक सीमित शी । आधुनिक युग में पश्चिम के प्रभाव में डिस्को, कैबरे, ब्रेक डांस, बैले आदि का प्रभाव भारतीय नृत्यों में आ गया है । साथ ही फिल्मीकरण के कारण अश्लीलता और कामुकता आ गयी है । अर्द्धनग्न शैली में भोंडापन नृत्यों में दिखाई देता है ।

नृत्य की शास्त्रीय परम्परा को उदयशंकर, गोपीकृष्ण,बिरजू महाराज, उमा शर्मा, सितारा देवी, सोनल मानसिंह, वैजयन्ती माला जैसे नृत्य प्रेमी जीवित रखने का प्रयास करते रहे हैं । वहीं भारत सरकार एवं राज्य सरकारें भी इस प्रयास में शामिल हैं ।

नाट्‌यकला:

नाट्‌यकला को ललित कला भी माना जाता है, जिसमें मनोरंजन तथा अभिनय व रस की सृष्टि की जाती है । भरत के नाट्‌यशास्त्र में 11 प्रकार के नष्टको का वर्णन है । पाणिनी और पतंजलि की व्याकरण सम्बन्धी रचनाओं में नाट्‌य सम्बन्धी सूत्र हैं ।

भरत के नाट्‌यशास्त्र में नाटक से सम्बन्धित विविध पक्षों, रंग, वस्तु, अभिनय, संगीत आदि का विशद निरूपण है । इसी प्रकार अश्वघोष, कालिदास, शुद्रक प्रसिद्ध नाटककार थे । कालिदास के नाटकों-अभिज्ञान शाकुंतलम, विक्रमोर्वशीय तथा शूद्रक का मृच्छकटिकम, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस-प्रसिद्ध है ।

विशुद्ध नाटकों की परम्परा के साथ-साथ लोकनाट्‌य, नटों की कला, रामलीला, कृष्णलीला, कठपुतली, नौटंकी, स्वांग भारतीय जनजीवन को मनोरंजन के साथ-साथ संस्कृति का ज्ञान भी कराते हैं । 19वीं शताब्दी में नुक्कड़ नाटक, झफ्टा, {जनवादी नाट्‌य} प्रचलित हैं । आज नाट्‌यकला में अनेक नवाचारों का प्रयोग किया जा रहा है ।

भारतीय साहित्यकला:

भारतीय साहित्यकला की इतनी समृद्ध, गौरवशाली, विपुल तथा सशक्त विरासत है, जिस पर सभी को गर्व होगा । धार्मिक साहित्य में वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद आते हैं । वैदिक साहित्य में शक्तिशाली देवताओं और दानवों के बीच संघर्ष का वर्णन है ।

वैदिककाल में 6 वेदांग हैं, इनमें शिक्षा, व्याकरण, कल्प, छन्द, ज्योतिष, निरुक्त हैं । प्राचीन भारतीय साहित्य में रामायण एवं महाभारत प्रसिद्ध पुस्तकें हैं । रामायण में जहां राम का आदर्श चरित्र है, वहीं महाभारत में कौरव और पाण्डव के बीच युद्ध की कथा है ।

जैनियों और बौद्धों के धार्मिक य-थ व्यक्तियों और घटनाओं पर आधारित हैं । जातक कथाएं पालि भाषा में हैं । जैन गन्धों की भाषा प्राकृत है । कौटिल्य का अर्थशास्त्र भारतीय राजतन्त्र एवं अर्थव्यवस्था के समन्वय का उदाहरण है ।

गुप्तकालीन साहित्य संगम साहित्य, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जीवन की जानकारी देता है । भारतीय विद्वानों में आर्यभट को गणितीय क्षेत्र में, कोसाइन साईन, पाई तथा शून्य निर्माण क्रिया की परिकल्पन पद्धति के लिए जाना जाता है ।

ब्रह्मगुप्त ने गुरात्चाकर्षण, वराहमिहिर ने खगोल, भूगोल, नागार्जुन ने रसायनशास्त्र के क्षेत्र में, इस्पात बनाने, पक्के रंग तैयार करने, चरक और सुभूत की संहिताओं में कपाल छेदन, हाथ-पैर काटे जाने तथा मोतियाबिन्द जैसी जटिल शल्यक्रिया का वर्णन है ।

जयदेव, अलवार और नयनार सन्त कबीर, नानक, गुरा गोविन्द सिंह, कल्हण, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, तुकाराम, नामदेव, ज्ञानेश्वर, बिहारी, घनानन्द, सेनापति, रसखान, प्रसिद्ध साहित्यकार रहे । आधुनिक युग में कविता, निबन्ध, नाटक, उपन्यास, एकाकी के साथ-साथ नयी विधाएं, रेखाचित्र, सस्मरण, आत्मकथा, जीवनी आदि प्रसिद्ध हुईं ।

प्रेमचन्द ने 300 कहानियां, 2 उपन्यास लिखकर कहानी व नाटक सम्राट का गौरव प्राप्त किया, वहीं प्रसाद ने ध्रुवरचामिनी, चन्द्रगुप्त, रकन्दगुप्त, अजातशत्रु आदि नाटक लिखकर नाटकसम्राट की उपाधि प्राप्त की । इस प्रकार साहित्य अपनी समृद्ध विरासत के साथ अपनी सृजन यात्रा में गतिशील है ।

उपसंहार:

इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति कलाओं के माध्यम से भी व्यक्त होती है । केला का निर्माण, रूप, प्रक्रिया एवं उसके सौन्दर्य बोध में कला का आनन्द प्राप्त होता है । कला संस्कृति का अंग है । कलाओं के प्रोत्साहन से मानव दुष्प्रवृत्तियों का शमन होता है ।


Hindi Essay # 5 लोकसंस्कृति की समृद्ध विरासत | The Rich Heritage of Popular Culture

1. प्रस्तावना ।

2. लोक साहित्य के विविध प्रकार ।

लोकगाथा । लोकगीत ।

लोककथा । लोकनाट्‌य ।

अन्य विधाएं ।

3. लोक संस्कृति ।

4. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

लोक साहित्य, अर्थात् लोक का साहित्य । लोक साहित्य लोक का साहित्य होता है और लोक का आशय रूढ़िगत तथा अर्द्धशिक्षित, अशिक्षित जनता से है । ऐसे साहित्य में तर्क के स्थान पर सहज विश्वास की प्रवृत्ति मिलती है ।

लोक साहित्य के पीछे लोक का मानस, विचार, पद्धति तथा आदिम अनुभूति होती है, जो अपने मूल रूप के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है । लोक साहित्य की भाषा जीवित होती है, जिसमें शास्त्रीय नियम व व्याकरण नहीं देखे जाते । इसकी सहज, रोचक शैली में जीवन की विविध अनुभूतियां मौखिक परम्परा में प्राप्त होती हैं ।

2. लोक साहित्य के विविध प्रकार:

लोक साहित्य के विविध प्रकारों में प्रमुख हैं:

(अ) लोकगाथा:

लोकगाथा लोककथात्मक गेय काव्य है, जो किसी विशेष कवि द्वारा लिखी जाती है, जिसमें गीतात्मकता और कथात्मकता होती है । यह पीढी दर पीढी हस्तान्तरित होती है । लोकगाथा का जन्म लोककण्ठ से होता है, जिसमें विचारों की सहजता, सरलता और विशेष पहचान होती है । इसमें मुहावरे, कहावतों और सरल छन्द का प्रयोग होता है । यह छोटी और बडी भी होती है ।

(ब) लोकगीत:

लोकगीत लोक में प्रचलित गीत होते हैं, जिनमें लोक मानस की लयात्मक अभिव्यक्ति होती है । लोकगीतों में सहजता और मधुरता होती है । इनमें छन्द, अलंकार आदि का चमत्कार नहीं होता है, इनमें मिट्टी की गन्ध होती है ।

(स) लोककथा:

लोककथा प्राचीनकाल से चली आ रही है । लोककथाओं में ऐसी कथाएं होती हैं, जो धार्मिक तथा व्रतानुष्ठानों से जुड़ी होती हैं । जैसे- महाभारत की कथा, रामायण की कथा ।

लोककथा वस्तुत: धर्मगाथाएं और पुराण कथाओं के रूप मे होती हैं । इनमें नैतिक जीवन मूल्यों की शिक्षा होती है । हमारे यहा स्त्रियां विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा, प्रार्थना के विषय में विभिन्न प्रकार की लोककथाएं कहती हैं ।

लोककथाओं का दूसरा रूप लोक कहानी के रूप में सामने आता है । लोक कहानी मौखिक रूप से प्रचलित रहती है और तीसरी तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह लोक में प्रचलित होती है । उसमें कोई-न-कोई लोक विश्वास अवश्य ही रहता है । इसमें लोक संस्कृति की झलक भी मिलती है । अंग्रेजी मे ऐसे ‘फाक टेल’ प्रचलित हैं ।

(द) लोकनाट्‌य:

लोक साहित्य में लोकनाट्‌य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एव गौरवशाली स्थान होता है । लोकनाट्‌य में विभिन्न पात्र पद्यात्मक शैली में अपने संवाद प्रस्तुत करके समूचे वातावरण को अत्यन्त ही मनोरंजक बना देते हैं ।

लोकनाट्‌य अत्यधिक लोकप्रिय एवं प्रभावोत्पादक सिद्ध होते है । इनमें गीत, नृत्य, संगीत की त्रिवेणी प्रवाहित होती है । गांवों में जनता नाट्‌य देखकर जितना अनुभव करती है, उतना अन्य किसी अन्य विद्याओं में नहीं करती है । लोकनाट्‌य को हम तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं । इनमें: (1) नृत्य प्रधान लोकनाट्‌य में (अ) विदेशिया, कीर्तनियां, कुरंवजि, गबरी, रास, नकाब और अंकिया, रास प्रमुख हैं ।

(2) संगीत प्रधान लोक प्रधान लोकनाट्‌य में स्वांग, अर्थात् नकल की प्रधानता रहती है । इसमें नकल, गम्मत, स्वांग, करियाल बहुरूपिया, भवाई, नट-नटिन प्रमुख है ।

(इ) अन्य विधाएं:

लोक साहित्य में लोकगाथा, लोकगीत, लोकनाट्‌य, लोककथा के अतिरिक्त भी अनेक विधाएं होती हैं । जैसे-मुहावरे, लोकोक्तियां, खेलगीत, लोरियां, पालने के गीत आदि । लोकोक्तियों में ग्रामीण जनता, पहेली, सूक्तियों का प्रयोग भी करती है । इन सभी में लोकजीवन का सार एवं मौखिक परम्परा सम्मिलित रहती है ।

3. लोक संस्कृति:

लोक संस्कृति का आशय लोकजीवन की संस्कृति से होता है । लोक संस्कृति अर्द्धशिक्षित, ग्राम्य जनसमूहों की उस संस्कृति का बोध कराती है, जो सीधे-सादे हैं । लोकजीवन में लोक का रहन-सहन, रीति-रिवाज, तीज, त्योहार, पर्व, खानपान, वेशभूषा, भाषा, धर्म, दर्शन, ज्ञान- विज्ञान, कला आदि विचार सम्मिलित होते हैं ।

लोक संस्कृति में वस्त्र सज्जा और मृगार प्रसाधनों का भी काफी उल्लेख मिलता है । घर में प्रयुक्त होने वाली दरी, बिछौन, रेशमी कलात्मक सामग्री के अलावा विशिष्ट परिधानों- चुनरी, धोती का उल्लेख मिलता है । लोक आभूषणों की सूची में महावर, केश विन्यास गुदाना, बिछिया, मुंदरी का भी वर्णन होता है ।

डोली, पालकी स्त्रियोचित वाहनों का प्रयोग होता है । लोक संस्कृति में पारिवारिक सम्बन्ध और समस्याएं, पारिवारिक जीवन की दिनचर्या, पारिवारिक जीवन के संस्कार, पारिवारिक सम्बन्ध निर्वाह, शिष्ट व्यवहार एवं आधार जो सौतिया डाह से लेकर देवर, ननद, भाभी के सम्बन्ध जैसे पारिवारिक संस्कारों का चित्रण मिलता है ।

लोक संस्कृति के सामाजिक पक्ष में त्योहार, रीति-रिवाजों, लोकप्रथाओं एवं मान्यताओं तथा सामाजिक मनोविनोद के साधनों, आश्रम व्यवस्था आदि का वर्णन मिलता है । चौसर, शतरंज, चिरई, उड़ान, कबूतर के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों का भी चित्रण मिलता है ।

लोक संस्कृति में लोक विश्वासों और मान्यताओं का बहुत अधिक महत्त्व होता है । जादू-टोना, टोटका, शगुन-अपशगुन होते हैं । इसमें कुछ धार्मिक विश्वास व मान्यता, तो कुछ लोक विश्वास की अद्‌भुत कथाएं होती हैं ।

4. उपसंहार:

लोकमंगल एवं लोककल्याण भारतीय संस्कृति का मूल स्वर है । लोकगीतों, लोककथा, लोकगाथा, लोकनाट्‌यों, लोक संस्कृति में भारतीय जनजीवन धड़कता है । लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति की मौखिक एवं संपन्न विरासत हमारी भारतीयता की पहचान है । इसमें निहित लोकादर्श में मानवीय तत्त्व प्रमुख हैं । लोकजीवन में बसी लोक साहित्य एवं संस्कृति में मिट्टी की गन्ध है, लोकचेतना है ।